जैन धर्म को जाने

।। आइये जैन धर्म को जाने ।।

जीवन में संस्कारों का विशेष महत्व है। उत्तम देश, उच्च कुल एवं मानव पर्याय प्राप्त होकर भी यदि मानव को सदाचरण रूपी अच्छे संस्कार प्राप्त नहीं होते हैं तो उसका जीवन पशु के समान ही निस्सार हो जाता है। कहा भी है-‘‘ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः‘ अर्थात् ज्ञान से रहित मानव पशु के समान माना जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रत्येक मानव को सुसंस्कारित होने के लिए तथ जिनागम के रहस्य को समझने के लिए बाल अवस्था से ही धार्मिक-नैतिक ज्ञान का ग्रहण करना बहुत ही आवश्यक है।

इस पुस्तिका के माध्यम से आप अपने ज्ञान की वृ़िद्ध करते हुए अपनी आत्मा का कल्याण करंे। जैन धर्म की पताका को दिगदिगन्त व्यापी बनायें। आप सभी धर्मप्रेमी बन्धुओं के लिए यही मंगल कामना है।

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भगवान जिनेन्द्रदेव की वाणी बारह अंगों में विभाजित है। इसे ही पूर्वाचायों ने चार अनुयोगों में अनुबद्ध किया है और इन अनुयोगांे को वेद संज्ञा भी दी है।

जो न्यूनता-अधिकता से रहित हैं, विपरीत भी नहीं हैं, मात्र जैसे के तैसे हैं और संदेह रहित हैं ऐसे वचनों को जैनाचार्यों ने ‘‘वेद‘‘ कहा है। इस वेद के प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग ऐसे चार भेद माने हैं।

वर्तमान का उपलब्ध जैन वाड्.मय इन चार अनुयोगों में ही विभक्त है।

इस ग्रंथ में सर्वप्रथम सृष्टि का क्रम बतलाया गया है। उसमें उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी के षट्काल परिवर्तन को दिखाया है। अवसर्पिणी के सुषमासुषमा, सुषमा आदि छह भेद होते है। इनमें से प्रथम के तीन कालों मे उत्तम, मध्यम और जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था रहती है। तृतीय काल के अंत मे चैदह कुलकर उत्पन्न होते हैं और चतुर्थकाल के प्रारंभ में अंतिम कुलकर से प्रथम तीर्थंकर जन्म लेते हैं। इस बार यहाॅं पर इस भरत क्षेत्र के आर्यखण्ड में हुण्डावसर्पिणी काल चल रहा है जो कि असंख्य उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी के बीत जाने पर एक बार आता है। इस काल में कुछ अघटित घटनाएॅं हो जाया करती हैं, जैसे-प्रथम तीर्थंकर का तृतीय काल में ही मोक्षगमन, प्रथम चक्रवर्ती की पराजय, नाना पाखण्डमतों की उत्पत्ति आदि।

इस प्रकार से इस प्रथम अनुयोग में चतुर्थ काल के बाद पंचम काल और छठे काल का वर्णन है। अनन्तर उत्सर्पिणी के दुःषमादुःषमा, दुःषमा आदि को लेकर छहों कालों का उल्लेख है। जैन सिद्धांत के अनुसार यदि सृष्टि का क्रम है जो कि अनादिकाल से चला आ रहा है, न इसका कोई कत्र्ता - ईश्वर विशेष है और न ही कोई इसका हर्ता-संहारक विशेष है। स्वयं ही स्वभाव से छठे काल के अंत में महाप्रलय होकर इस सृष्टि का संहार हो जाता है। इसी में से कुछ युगल जोडे बचते हैं जिनसे पुनः आगे की सृष्टि चलती है। यह काल परिवर्तन मात्र मध्यलोक के ढाई द्वीप संबंधी पाॅंच भरत और पाॅंच ऐरावत क्षेत्रों के आर्यखण्डों मंे ही होता है, अन्यत्र नहीं। विदेह क्षेत्र की एक सौ आठ नगरियों में, म्लेच्छ खण्डों में, विजयार्ध पर्वत की श्रेणियों की विद्याधर नगरियों में, ढाई द्वीप के असंख्यात द्वीप-समूहों मंे, स्वर्गों में और नरकों में यह षट्काल परिवर्तन नहीं होता है और न वहाॅं महाप्रलय ही होता है। जहाॅं जो व्यवस्था, वहां वही सदाकाल रहती है। विदेह क्षेत्रों में यहां के चतुर्थकाल के प्रारंभ के सदृश कर्मभूमि की व्यवस्था ही रहती है। म्लेच्छ खण्डों में और विजयार्ध पर्वत की श्रेणियों के विद्याधरों में चतुर्थकाल के आदि से अंत तक परिवर्तन होता रहता है। जो भोगभूमि हैं वहां शाश्व्त वही व्यवस्था है। स्वर्गों की और नरकों की भी जो व्यवस्था है, सो ही है क्योंकि वहां पर छह काल की परिवर्तन चक्र नहीं है। इस अनुयोग में महापुरूषों के जीवन चरित्र में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरूषार्थों का वर्णन आता है। श्रीसमन्तभद्रस्वामी के वचनानुसार चारों पुरूषर्थों का, महापुरूषों के चरित्र और पुराणों का जिसमें वर्णन हो, वह प्रथमानुयोग कहलाता है।

करणानुयोग के प्रकरण में इस ग्रंथ में सर्वप्रथम तीन लोक का वर्णन किया गया है। इस तीन लोक के वर्णन में ही अधोलोक मंे होने वाले सात नरकांे का उल्लेख है पुनः पहली पृथ्वी के ऊपर के दो भागों में रहने वाले भवनवासी व व्यंतरवासी देवों का वर्णन किया गया है। अनन्तर मध्यलोेक के असंख्यात द्वीप-समुद्रों का वर्णन करते हुए प्रथम ही जम्बूद्वीप का वर्णन किया गया है। इस मध्यलोेक के अन्तर्गत ही ज्योतिर्वासी देवों का वर्णन किया है। अनंतर ऊध्र्वलोक के वर्णन में स्वर्गों का, उनमें रहने वाले देवों का वर्णन है। इस तरह तीन लोक के आश्रित चार गतियों का और चार प्रकार के देवों का वर्णन किया गया है पुनः जीव के द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भाव इन पांच परिवर्तनों का स्वरूप बताया गया है। इस प्रकार श्री स्वामी समन्तभद्राचार्य के कहे अनुसार इस अनुयोग में लोक-अलोक का विभाग और चारों गतियों का स्वरूप बतलाया गया है। युग-परिवर्तन का वर्णन यहां नहीं किया गया है क्योंकि इसका वर्णन प्रथमानुयोग के प्रारंभ मंे ‘सृष्टि का क्रम‘ बतलाते हुए संक्षेप में युगपरिवर्तन दिखा गया है।

चरणानुयोग में सर्वप्रथम सम्यक्त्व का वर्णन है पुनः धर्म के सागार धर्म और अनगार धर्म ऐसे दो भेद विवक्षित करके पहले सागारधर्म का वर्णन किया गया है। इस धर्म के वर्णन में श्रावक के पाक्षिक, नैष्ठिक और साधक भेदों का उल्लेख है। चार प्रकार के आश्रमों का कथन है, श्रावकों की षट् आवश्यक क्रियाओं का विवरण है पुनः ग्यारह प्रतिमाओं का भी संक्षिप्त दिशानिर्देश है। सल्लेखना की विधि को बतलाकर सूतक-पात विधि का भी विधान दर्शाया गया है।

आगे चलकर बारह भावनाओं को वैराग्य की जननी मानकर उनका वर्णन है पुनः मुनिधर्म के अन्तर्गत दिगम्बर मुनियों के अठाईस मूलगूणों का तथा उनके उत्तरगुणों का विवेचन किया गया है। दशधर्म, सोलहकारण भावनाएं इस अनुयोग में वर्णित है। इस चरणानुयोग में वर्णित धर्म अपने नाम के अनुरूप मोक्ष महल में चढने के लिए चरण - पैरों को रखने के समान हैं। जैसे कोई भी व्यक्ति एक-एक चरण को उठाकर आगे-आगे की सीढियों में रखते हुए ही ऊपर की मंजिल मंे पहुंचाता है, ऐसे ही अनुयोग मंे कहे गये धर्मो का आचरण करने वाला व्यक्ति भी क्रम-क्रम से चारित्र को बढाता हुआ आगे-आगे बढता हुआ मोक्ष नगर में पहुंच जाता है अतः इसी अनुयोग के अंतर्गत ध्यान का भी वर्णन किया गया है। चूंकि ध्यान चारित्र के अंतर्गत तपच्श्ररण का ही अंतिम भेद है। श्री समंतभद्र स्वामी के कहे अनुसार इस चरणानुयोग में गृहस्थ और मुनियों के चारित्र की उत्पत्ति का, उसकी वृद्धि का, चारित्र की रक्षा के उपायों का वर्णन किया गया है।

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द्रव्यानुयोग में सर्वप्रथम छहांे द्रव्यों का नाम निर्देश है पुनः जीव द्रव्य का वर्णन करते हुए पहले जीव को नव प्रकार से कहा गया है अनन्तर गुणस्थान, समास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा, मार्गणा और उपयोग इन सबके द्वारा जीव का संक्षिप्त वर्णन किया गया है पुनः पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल का अतिसंक्षिप्त कथन करके आगे प्रमाण का कथन किया गया है। इस प्रमाण के भेद-प्रभेदों का पहले सिद्धांत ग्रंथों की अपेक्षा वर्णन किया गया है पुनः न्याय ग्रंथों के आधार से भी संक्षिप्त विवेचन किया गया है। नयों का वर्णन करते हुए द्रव्यार्थिक, पर्यायर्थिक, नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवंभूत ऐसे नव प्रकार के नयों का और इनके अनेक भेदों का एवं उपनयों का भी वर्णन है पुनः अध्यात्म की अपेक्षा से निश्चय-व्यवहार सद्भूत-असद्भूत नयों का विवेचन है। स्याद्वाद की सिद्धि करते हुए सप्तभंगी का सुंदर है - औपशमिक, क्षायिक आदि अनेक भेदों का वर्णन किया गया है। इन सबके अनंतर षट्दर्शन का वर्णन करते हुए चार्वाक, बौद्ध, सांख्य, नैयायिक, मीमांसक और वेदांतियों के दर्शन का उल्लेख है। इन एकान्तमतों का निरसन करके जैन दर्शन का संक्षिप्त कथन है और सर्वज्ञ की सिद्धि की गई है।

अनंतर आत्मा के बहिरातमा, अनंतरात्मा और परमात्मा भेद करके इन तीनों का विवेचन किया गया है पुनः मोक्षमार्ग के विवेचन में व्यवहाररत्नत्रय और निश्चयरत्नत्रय का सरल वर्णन है। आगे निश्चय मोक्षमार्ग के अंतर्गत संसार के नाश करने वाले चार कारणों का विवेचन है। निर्जरा के स्थानों का और नव केवललब्धियों का अधिक वर्णन है पुनः कर्मसिद्धांत के प्रकरण में कर्मों के भेद-प्रभेद, लक्षण, कर्मों के कारण का कथन है। बंध, उदय और सत्ता की प्रकृतियों का संक्षिप्त विवेचन है पुनः कर्मों के आस्त्रव का विवेचन है। अनंतर कर्मबंध का कारण का विवेचन करते हुए उसके मिथ्यात्व, अविरति आदि पांच भेदों का एवं उनके अंतर्भूत अनेक प्रभेदों का विवेचन किया गया है। इससे अनंतर मोक्ष के कारणों में सम्यक्त्व की प्राप्ति हेतु पांच लब्धियों का वर्णन है। तीन प्रकार के सम्यक्त्व का लक्षण बतलाकर चारित्र को लिया है। कर्मों के नाश का क्रम दर्शाते हुए केवली भगवान के कवलाहार का निषेध किया है पुनः मुक्त हुए जीवों का स्थान, उनकी अवगाहना, संख्या और उन सिद्ध भगवान के गुणों का निरूपण किया गया है।